लकड़हारा युग में पुनः जाने की मजबूरी, जंगल से लकड़ी लाने का क्रम जारी

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मयंक विश्वकर्मा, आम्बुआ

मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध के कारण तेल तथा गैस आदि की आपूर्ति तथा भाव बढ़ जाने के देश सहित प्रदेश तथा जिला क़स्बों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक ईंधन का संकट कुछ ऐसा खड़ा हुआ कि होटलों से लेकर घरों के चूल्हों तक हाहा कार मचा हुआ है, होटलों आदि में भोजन नाश्ता आदि सब कुछ महंगा होकर आम नागरिकों की जेब पर सीधा असर पड़ता दिखाई दे रहा है।

इधर घरेलू तथा व्यवसायिक गैस सिलेंडर के भाव बढ़ने तथा आपूर्ति नहीं होने के कारण भी परेशानी खड़ी हो गई है,मजबूरन चूल्हों एवं भट्टों में लकड़ी का उपयोग प्रारंभ हो चुका है, जिसके लिए गीले सूखे पेड़ काटने का सिलसिला चालू हो गया है वर्षों बाद ग्रामीण क्षेत्रों से महिला पुरुष जंगल से लकड़ी के गट्ठर सिर पर रख कर शहरों तथा कस्बों की ओर आते दिखाई देने लगे हैं,यानि कि हम पुनः लकड़हारा युग की ओर लौटते नजर आ रहे हैं तथा घरों एवं होटलों आदि से धुआं निकलता दिखाई देने लगा है,जिस धुंऐ से महिलाओं को बचाने हेतु देश के प्रधानमंत्री ने उज्जवला योजना प्रारंभ की थी वह ढहती नजर आ रही है।

क्या कहते हैं होटल व्यवसाई तथा गृहणियां 

विगत महिनों से गैस सिलेंडर मिलने में परेशानी हो रही है,घरों में भोजन बनाने में आदि में परेशानी हो रही है।

मनोरमा अगाल ग्रृहणी

2-युद्ध के कारण विदेशों से आने वाली गैस की आपूर्ति कम हो ने तथा व्यवसायिक गैस सिलेंडर महंगा हो जाने के कारण होटलों में भट्टे चलाना मुश्किल हो रहा है मजबूरन हमें लकड़ी की व्यवस्था करना पड़ रही है जिस कारण धुंआ होता है तथा वायु प्रदूषण फैलता है।

1– कमल भूरिया

2–कमलेश गोयल

3– राकेश राठौड़

4– दीपक परिहार

5– रितेश डामोर

सभी होटल व्यवसाई

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