जब भी ईश्वर से मांगे पूरी आस्था,श्रद्धा व विश्वास से मांगे वो देने को तैयार हैं-पंडित योगेश शास्त्री

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भूपेंद्र चौहान, चंद्रशेखर आजाद नगर

“ईश्वर हमें देने के लिए तैयार हैं हम जब भी मांगे पूरी आस्था,श्रद्धा व विश्वास के साथ मांगे” यह भी ध्यान रखे कि हमें मांगते भी आना चाहिए।

यह बात सात दिवसीय संगीतमय देवी पुराण के पांचवे दिन कालिका मन्दिर परिसर में व्यासपीठ से विद्वान पंडित योगेश शास्त्री ने कथा श्रावकों से कहीं।

पंडित शास्त्री ने राजा ओर सेवक के प्रसंग से बताया अपने ईष्ट से हम किस प्रकार एक ही बार में एक ही वाक्य में कैसे मांगे। माता से मांगने के लिए मां के प्रति अटूट आस्था, श्रद्धा,विश्वास व समर्पण भी होना जरूरी हैं। कथा में वेद व्यास का जन्म कैसे हुआ प्रसंग के माध्यम से बताया। आगे की कथा बताते हुवे वेद व्यास के द्वारा पुत्र रूप में स्वंय शिव को मांग लिया जिससे सुखदेव जी का जन्म हुआ।जो त्याग करता हैं वहीं पाता हैं। सामान्यतः लोग ईश्वर से पुत्र या पुत्री मांगते हैं लेकिन वास्तव में हमें ईश्वर से पुत्र या पुत्री के रूप में स्वयं भगवान को मांगना चाहिए। जिससे होने वाली संतान संस्कारी व उत्तम हो।सनातन व रिश्तों को बचाने के लिए परिवार में कम से कम तीन पुत्र व तीन पुत्री होना चाहिए।अपनी कमाई का आधा बहन बेटी,धर्मकाज,दान,गौ सेवा, संत सेवा आदि में लगाना चाहिए। अपने घर व्यवस्था हो या नहीं लेकिन अपने गांव में एक गौ शाला जरूर हो जिसमें अपनी ओर से गौ सेवा करना चाहिए। कलयुग में गौसेवा से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। पुरूषोत्तम मास में गौदान,स्वर्ण दान व अन्नदान का विशेष महत्व हैं।वंश को बढ़ाने के लिए पुत्र या पुत्री का होना जरूरी हैं। माता-पिता का जीवन में बड़ा उपकार होता हैं उन्हें कभी ऊंचा ना बोले,गलत ना बोले ये वे हैं जिनका हम कभी ऋण पूरा नहीं कर सकते हैं। माता पिता की भक्ति व आज्ञा पालन में भीष्म पितामह का उदाहरण दिया जिन्होंने माता पिता के लिए कभी राजपाठ नहीं सम्भाला न ही विवाह किया।

कलयुग में माताओं से अपेक्षा हैं जो अपेक्षा बहु से करती हैं वह अपनी बेटियों को भी शिक्षा दे ताकि विवाह उपरांत उनका घर संसार बना रहे।

उच्चारण “ऊँ”अक्षर में ब्रम्हा,विष्णु,महेश और माँ दुर्गा समाहित हैं।पंडित शास्त्री ने तुलसी को साक्षात् रूखमणी का रूप बताया।पांचवे दिन की कथा के अंत में रूखमणी व भगवान कृष्ण के विवाह का करवाया गया।तुलसी व भगवान नारायण का विवाह यजमान वर-वधू चौहान परिवार की यजमानी में संपन्न हुआ। तुलसी विवाह में उपस्थित महिलाओं ने मंगलगीत गाये व नृत्य किया। विवाह में छप्पन प्रकार के पकवानों का भोग लगाया गया।

पांचवें दिन की कथा का समापन यजमान परिवार द्वारा आरती प्रसादी वितरण के साथ किया गया। 

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