मयंक विश्वकर्मा, आम्बुआ

शिक्षण संस्थाओं में इस वर्ष बच्चों को शाला गणवेश समय पर नहीं दिए गए। बच्चों तथा पालको एवं समाचार पत्रों जब हो हल्ला किया गया। तब कहीं जाकर जनवरी के द्वितीय सप्ताह में भेजे गए गणवेश बच्चों की नाप बगैर सिले होने के कारण छोटे बड़े मिल रहे हैं । वहीं पहली से पांचवी तक लड़कों को हाफ शर्ट एवं नेकर देने से भी परेशानी हो रही है । यह समय ठंड के मौसम का होने से अधिक परेशानी हो रही है। इस वर्ष गणवेश सिलाई का कार्य आजीविका मिशन को दिया गया,  जहां पर बैठे जवाबदारो ने अपनी आजीविका की जुगाड़ करने में इतना समय बर्बाद कर दिया कि समय पर बच्चों को ड्रेस उपलब्ध नहीं हो सकी और शिक्षण सत्र समाप्ति की कगार पर आ गया । गणवेश समय पर नहीं मिलने के समाचार समाचार पत्रों में प्रकाशित होने के बाद प्रशासन की नींद खुली और तब आजीविका मिशन जिसे कार्य दिया गया था पर नकेल कसी गई आनन-फानन में आजीविका मिशन ने बगैर नाप लिए यूनिफार्म सिलाई करवा दी तथा कुछ रेडीमेड भी शायद खरीद लिए गए ऐसा इसलिए लग रहा है कि कुछ यूनिफॉर्म पर आजीविका मिशन का रेपर (नाम) लगा हुआ है तो कई बगैर रे॔पर के हे कपड़ा भी औसत स्तर का बता जा रहा है आजाद नगर विकास खंड क्षेत्र में संचालित आजीविका मिशन सिलाई केंद्र पर कुछ पत्रकारों ने जाकर वस्तु स्थिति जानना चाही तो सेंटर पर ताला पड़ा मिला था कोई भी जवाबदार वहा नहीं मिला शायद पत्रकारों के आने की भनक केंद्र संचालक को मिल गई होगी ।
शिक्षण सत्र समाप्ति की ओर है तथा अभी ठंड का मौसम है ऐसे समय में छोटे बच्चों को हाफ शर्ट एवं हाफ पेंट (नेकर) वितरण किए जा रहे हैं जिन्हें पहनकर सुबह सुबह स्कूल आना कितनी मुसीबत भरा होता होगा भुक्तभोगी बच्चे ही जान सकते हैं।  यूनिफार्म का कपड़ा भी औसत स्तर का बताया जा रहा है शासन प्रशासन को चाहिए कि आजिविका मिशन द्वारा विलंब होने पर कार्यवाही करें एवं कपड़े के स्तर की जांच भी करें । पालकों की मांग है कि समय पर गणवेश दी जाए या फिर बच्चों या पालक के खाते में राशि हस्तांतरित की जाए ताकि पालक स्वयं खरीद सके। इधर गरीब बच्चों की स्थिति यह है कि कपड़े तो मिल रहे हैं मगर जूते मौजे के उनकी ड्रेस अधूरी है उनकी मांग है कि यह भी दिलाए जाए।

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