जितेंद्र वाणी, नानपुर

ग्राम फाटा निवासी प्रतिभाशाली युवती श्वेता दिलीप सिंह चौहान इन दिनों अपनी कला प्रतिभा के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को समझने की अपनी पहल को लेकर चर्चा में हैं।

श्वेता ने हाल ही में अपने क्षेत्र में स्थापित जननायक टंट्या भील की प्रतिमा की स्वयं साफ-सफाई एवं पेंटिंग कर विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व तैयारी की।खास बात यह रही कि यह पहल उन्होंने बिना किसी के कहने या निर्देश के स्वयं की, जिसे सामाजिक कार्यकर्ता नितेश अलावा ने आदिवासी समाज की नई पीढ़ी के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बताया है।

सामाजिक कार्यकर्ता नितेश अलावा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में श्वेता की पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि श्वेता ने कभी भी पिथौरा को केवल ‘पेंटिंग’ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। बल्कि उसने पिथौरा के पीछे जुड़ी आस्था, परंपरा और अनुष्ठान को समझने का प्रयास किया है।

नितेश अलावा के अनुसार, श्वेता ने हाल ही में ट्राइबल स्टडीज विभाग, इंदौर में प्रवेश लिया है और विभिन्न बड़े आयोजनों में हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा एवं सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं।

उन्होंने बताया कि 9 अगस्त के बाद श्वेता से हुई बातचीत में यह जानकर उन्हें विशेष खुशी हुई कि श्वेता अपने घर लौटकर बड़े-बुजुर्गों और बड़वों से पिथौरा सहित पारंपरिक रीति-रिवाजों, देवी-देवताओं और अनुष्ठानों को समझ रही हैं।

जहां वर्तमान समय में आदिवासी संस्कृति को आधुनिक मंचों पर प्रस्तुत करने की होड़ में कई बार हमारी पारंपरिक मान्यताओं और उनके मूल संदर्भ को समझे बिना उन्हें केवल कला या सजावट के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है। ऐसे समय में श्वेता का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है कि पिथौरा केवल चित्रकला नहीं, बल्कि आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा हुआ विषय है।

क्षेत्र के जनपद उपाध्यक्ष मेहरसिंह चौहान फाटा ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि—

“कला को आगे बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन कला के पीछे की संस्कृति, आस्था और परंपरा को समझना उससे भी अधिक जरूरी है। हमारी नई पीढ़ी जब अपनी संस्कृति को समझकर आगे बढ़ेगी, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सकेगी।”

श्वेता की पहल की सराहना करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनिल तंवर कहा कि आने वाले समय में समाज के बड़े आयोजन में श्वेता को मंच देकर सम्मानित करने का प्रयास किया जाना चाहिए , ताकि ऐसे युवाओं को प्रोत्साहन मिले और अन्य युवा भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने के लिए प्रेरित हो।

ज्ञात रहे कि श्वेता ने हाल ही में आयोजित आलीराजपुर कॉलेज ऑडिटोरियम में लिखंदरा परिसंवाद में भाग लिया था जिसकी पोस्ट ट्राइबल डिपार्टमेंट और ट्राइबल म्यूज़ियम विभाग भोपाल ने भी की थी।

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