वनभाजी उत्सव: जनजातीय समाज की समृद्ध ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण की पहल

0

शिवा रावत, उमराली

जिले के अठ्ठावां गाँव में आज वनभाजी उत्सव का आयोजन उत्साह और आत्मीयता के साथ संपन्न हुआ। यह आयोजन परिसर सेवा समिति ग्राम अठावा एवं स्थानीय ग्रामीणवासियों के संयुक्त प्रयास से किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य जनजातीय समाज की पारंपरिक वनभाजी, पोषण एवं आयुर्वेद आधारित समृद्ध ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करना, उसका संरक्षण करना तथा नई पीढ़ी तक पहुँचाना था।

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, अलीराजपुर के प्रभारी डॉ. आर. के. यादव, शिव गंगा झाबुआ से आए राजा राम कटारा सांसद अनिता-नागरसिंह चौहान,जिला पेसा कोऑर्डिनेटर प्रवीण चौहान, जन अभियान परिषद के प्रभारी  नगरिया सस्तिया, ग्राम पंचायत के सरपंच  खेमराज सोलंकी, परिसर सेवा समिति ग्राम अठावा के प्रमुख श्री ढेडूसिंह जी डावर तथा सामाजिक कार्यकर्ता श्री कादू सिंह डुडवे सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।

बारिश के बीच जब गाँव की माताएँ और बहनें अपने-अपने घरों से सिर पर टोकरी रखकर वनभाजियाँ लेकर उत्सव स्थल की ओर पहुँचीं, तो पूरा दृश्य जनजातीय जीवन की आत्मीयता और सहजता को अभिव्यक्त कर रहा था। पलाश के पत्तों से सजी टोकरियाँ और उनमें रखी अलग-अलग प्रकार की देशी वनभाजियाँ इस आयोजन को विशेष बना रही थीं। जब किसी माँ से पूछा जाता—“माँ, क्या बनाकर लाई हो?” तो उनके चेहरे पर उभरती मंद-मंद मुस्कान मानो अपने बेटों के प्रति उमड़ते वात्सल्य और स्नेह की कहानी कह रही थी। भाभियों और बहनों का अपनापन, माताओं का स्नेह और ग्रामीणों का निर्मल, सहज एवं सादगीपूर्ण व्यवहार इस पूरे आयोजन की आत्मा बन गया। यह केवल वनभाजियों का उत्सव नहीं था, बल्कि जनजातीय समाज के सामाजिक ताने-बाने, पारिवारिक आत्मीयता और सामुदायिक जीवन-दृष्टि का जीवंत दर्शन था।

जनजातीय समाज की पारंपरिक जीवन-पद्धति में वनस्पतियों और वनभाजियों का ज्ञान केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा है। यह ज्ञान पोषण, स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की एक दीर्घ परंपरा का हिस्सा रहा है। हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभवों के आधार पर स्थानीय वनस्पतियों के गुणों को पहचाना और उन्हें दैनिक जीवन तथा स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा। समय के साथ आधुनिक भौतिक एवं तकनीकी विकास और बदलती जीवनशैली के प्रभाव में यह पारंपरिक ज्ञान धीरे-धीरे पीछे छूटता गया। नई शिक्षा और आधुनिक जीवन-पद्धति अपनाने की प्रक्रिया में कई बार अपनी स्थानीय ज्ञान परंपराओं को कमतर समझा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रकृति आधारित भोजन, स्थानीय वनस्पतियों और पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान की अनेक उपयोगी व्यवस्थाएँ कमजोर पड़ने लगीं।

लेकिन परिवर्तन के इस दौर में अब पुनः जागरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ और उनके कार्यकर्ता जनजातीय समाज की इसी अंतर्निहित शक्ति और समृद्ध ज्ञान परंपरा की ओर समाज का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। उद्देश्य यह है कि झाबुआ-अलीराजपुर अंचल के गाँवों को अधिक स्वस्थ और निरोगी बनाने के लिए पूर्वजों से प्राप्त इस ज्ञान को पुनर्जीवित किया जाए, वैज्ञानिक दृष्टि से समझा जाए तथा उसका संरक्षण और संवर्धन किया जाए।

वनभाजी उत्सव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इस अवसर पर ग्रामीण महिलाओं द्वारा अनेक प्रकार की पारंपरिक एवं देशी वनभाजियाँ तैयार कर लाई गईं। इनमें देशी करेले की विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ, शेंगा की भाजी, कुलार की भाजी, राजगिरी की भाजी, झरकली की भाजी, कीकोड़ा-कटले की भाजी, देशी भिंडी की भाजी सहित अनेक प्रकार की स्थानीय वनभाजियाँ शामिल थीं।

इन पारंपरिक व्यंजनों का सामूहिक रूप से मक्का, ज्वार और बाजरे की रोटी तथा स्थानीय चटनी के साथ आनंद लिया गया। भोजन के माध्यम से न केवल स्वाद और पोषण का अनुभव हुआ, बल्कि यह भी अनुभव हुआ कि स्थानीय संसाधनों पर आधारित हमारी पारंपरिक खाद्य संस्कृति कितनी विविध, पौष्टिक और प्रकृति के अनुकूल रही है। वनभाजी उत्सव ने यह संदेश दिया कि हमारी परंपराएँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं हैं, बल्कि उनमें वर्तमान और भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण ज्ञान छिपा हुआ है। आवश्यकता है कि इस ज्ञान को सम्मान के साथ पुनः समाज के बीच लाया जाए, उसका दस्तावेजीकरण किया जाए और नई पीढ़ी को उससे जोड़ा जाए।

अठ्ठावां गाँव का यह वनभाजी उत्सव इसी जीवंत परंपरा का उत्सव था—प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, माताओं के ज्ञान का सम्मान, स्थानीय भोजन की प्रतिष्ठा और जनजातीय समाज की सामुदायिक शक्ति का पुनर्जागरण। ऐसा ही है हमारा जनजातीय समाज—जहाँ प्रकृति भोजन देती है, परंपरा ज्ञान देती है और समाज उस ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखता है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.