सरपंच की रिपोर्ट में बड़ी ‘मेडिकल मिस्ट्री’! एक दिन में बदल गए हीमोग्लोबिन, प्लेटलेट्स और RBC
रिपोर्टों में भारी अंतर से उठे सवाल, पैथोलॉजिस्ट की निगरानी और रिपोर्ट सत्यापन प्रक्रिया भी जांच के घेरे में
शान ठाकुर, पेटलावद
ग्राम पंचायत अमरगढ़ के सरपंच पिंटू सिंह भूरिया की दो पैथोलॉजी रिपोर्टों में सामने आए बड़े अंतर ने क्षेत्र में निजी पैथोलॉजी लैबों की कार्यप्रणाली और जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरपंच भूरिया ने पाटीदार लैब पर गंभीर आरोप लगाते हुए पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच, लैब को तत्काल सील करने तथा उसका लाइसेंस निरस्त करने की मांग की है।
अगर सरपंच के साथ झोल तो आम व्यक्ति कैसे सुरक्षित ?
सरपंच पिंटू सिंह भूरिया का कहना है कि यदि एक जनप्रतिनिधि और शिक्षित व्यक्ति की जांच रिपोर्टों में इतने बड़े स्तर की विसंगतियां सामने आ सकती हैं, तो ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र के आम मरीजों के साथ क्या हो रहा होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच के नाम पर लोगों से पैसे तो लिए जा रहे हैं, लेकिन रिपोर्टों की शुद्धता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।


दो रिपोर्ट, आंकड़े चौकने वाले
प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार 3 जून 2026 को जारी पहली जांच रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन 7.9 ग्राम, आरबीसी 2.62 मिलियन, कुल श्वेत रक्त कणिकाएं (डब्ल्यूबीसी) 2400 तथा प्लेटलेट्स 1.35 लाख दर्ज किए गए थे। वहीं लगभग 24 घंटे बाद 4 जून 2026 को जारी दूसरी रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन 11.2 ग्राम, आरबीसी 5.61 मिलियन, डब्ल्यूबीसी 4700 तथा प्लेटलेट्स 2.95 लाख दर्शाए गए हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद कुछ रक्त मानकों में सुधार संभव है, लेकिन कई महत्वपूर्ण पैरामीटरों में दिखाई दे रहा व्यापक अंतर तकनीकी जांच की मांग करता है। विशेष रूप से आरबीसी, एमसीवी, डब्ल्यूबीसी और प्लेटलेट्स में दर्ज बदलावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या दोनों रिपोर्टें पूरी तरह सटीक हैं अथवा कहीं न कहीं जांच प्रक्रिया, सैंपल प्रबंधन, मशीन कैलिब्रेशन या रिपोर्ट सत्यापन में कोई त्रुटि हुई है।

एमडी डॉक्टर के हस्ताक्षर पर भी उठे सवाल
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू रिपोर्टों पर अंकित एमडी पैथोलॉजिस्ट का अनुमोदन भी है। दोनों रिपोर्टों पर एक विशेषज्ञ पैथोलॉजिस्ट का नाम और अनुमोदन दर्ज है। ऐसे में यह प्रश्न भी उठ रहा है कि रिपोर्टों का वास्तविक परीक्षण और सत्यापन किस प्रकार किया गया। क्या संबंधित विशेषज्ञ द्वारा रिपोर्टों की विधिवत समीक्षा की गई थी? क्या रिपोर्ट जारी होने से पहले आवश्यक गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रिया अपनाई गई थी? और यदि रिपोर्टों में इतने बड़े अंतर मौजूद थे तो क्या उन्हें विशेषज्ञ स्तर पर चिन्हित किया गया था?
जानकारों का मानना
वर्तमान समय में डिजिटल माध्यम से रिपोर्टों का अनुमोदन संभव है, लेकिन इसके लिए विशेषज्ञ द्वारा रिपोर्ट की वास्तविक समीक्षा और निगरानी आवश्यक होती है। ऐसे में प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित पैथोलॉजिस्ट द्वारा रिपोर्ट सत्यापन की प्रक्रिया क्या थी और लैब में गुणवत्ता नियंत्रण के कौन-कौन से मानकों का पालन किया गया।
