पोथी यात्रा, माखनचोरी व सुदामा चरित्र प्रसंग से भाव-विभोर हुए श्रद्धालु, संत रघुवीर दास जी ने की गोसेवा की अपील

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भूपेंद्र नायक, पिटोल

स्थानीय राधा-कृष्ण मंदिर में 19 से 26 सितंबर तक आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथामृत का भव्य समापन भागवत पोथी की शोभायात्रा और 56 भोग प्रसाद वितरण के साथ हुआ। तलवाड़ा द्वारकाधीश गौशाला के संत रघुवीर दास जी महाराज के मुखारविंद से प्रतिदिन दोपहर 1 से 4 बजे तक अमृत वर्षा हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया।

कथा मनोरंजन नहीं, आत्मरंजन का साधन है

कथा के दौरान महाराज श्री ने कहा कि कई जन्मों के पुण्यों के संचय से सत्संग का अवसर मिलता है। कथामृत प्रभु का शाब्दिक अवतार है, जो मनोरंजन नहीं बल्कि आत्मरंजन कराता है। सत्संग से काम, क्रोध, मद, लोभ और अहंकार का नाश होता है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में सहज प्रेम घट रहा है। जैसे-जैसे मनुष्य धर्म और ईश्वर से विमुख होता जाएगा, वैसे-वैसे उसकी आयु और शक्ति क्षीण होती जाएगी। उन्होंने गृहस्थ जीवन जीने की कला भगवान शिव से सीखने का आह्वान करते हुए कहा कि भगवान और भक्त के बीच का सच्चा सेतु केवल निष्काम भक्ति है।

माखनचोरी लीला: भगवान को भूख माखन की नहीं, प्रेम की है

कथा प्रसंग में माखनचोरी लीला का वर्णन करते हुए संत श्री ने कहा कि कन्हैया माखनचोर नहीं, बल्कि चित्तचोर हैं। यशोदा मैया के घर किसी बात की कमी नहीं थी, परंतु ठाकुर जी को गोपियों के निष्कपट प्रेम से बने माखन में ही आनंद आता था। जैसे कन्हैया माखन चुराते हैं, वैसे ही वे भक्त के हृदय से अहंकार रूपी विकार को हर लेते हैं। इस दौरान “मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो” भजन और बाल गोपाल की मनमोहक झांकी पर श्रद्धालु झूम उठे।

सुदामा चरित्र: मित्रता में लेन-देन नहीं, आत्मीयता होनी चाहिए

कथा के दौरान जब महाराज जी ने कृष्ण-सुदामा प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया, तो पूरा पंडाल भाव-विभोर हो उठा और कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा कि आज मित्रता स्वार्थ पर टिक गई है, जबकि कृष्ण और सुदामा का चरित्र सिखाता है कि मित्रता में लेन-देन नहीं, समर्पण होना चाहिए। सुदामा जी ने कभी कुछ नहीं मांगा, लेकिन भगवान ने उनकी निष्काम भक्ति के बदले तीनों लोकों का ऐश्वर्य अर्पित कर दिया।

विभिन्न अवतारों के प्रसंग और जन्मोत्सव

सप्ताह भर चली कथा में नृसिंह अवतार, गजेंद्र मोक्ष, धन्वंतरि प्राकट्य, कश्यप अवतार, मोहिनी अवतार, वामन अवतार, मत्स्य अवतार, राजा बलि चरित्र, श्री राम जन्मोत्सव और श्री कृष्ण जन्मोत्सव के प्रसंग श्रद्धापूर्वक मनाए गए। नन्हे-मुन्ने बालकों ने चॉकलेट और माखन मिश्री का प्रसाद ग्रहण किया। ‘गोपी’ शब्द की व्याख्या करते हुए महाराज श्री ने बताया कि अपनी दसों इंद्रियों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना ही सच्ची गोपी भाव की भक्ति है।

गोवंश की रक्षा ही प्रकृति की रक्षा: संत श्री

संत रघुवीर दास जी ने श्रद्धालुओं से भावुक अपील करते हुए कहा कि सनातन धर्म का प्राण गौमाता हैं। गोसेवा से ही पंचतत्वों और प्रकृति का शोधन संभव है। गोवंश की रक्षा संपूर्ण सृष्टि की रक्षा है, इसलिए हर सनातनधर्मी को गोसेवा का संकल्प लेना चाहिए।

सुमधुर भजनों ने बांधा समां

कथा के दौरान संगीत पक्ष पर डूंगरपुर के तबला वादक ओमप्रकाश जेठवा, कुशलगढ़ के भजन गायक विपिन भट्ट, छींच के पंडित नरेंद्र आचार्य, तलवाड़ा के सतीश त्रिवेदी और खेड़ा के शैलेश भट्ट ने अपनी सुमधुर भजन प्रस्तुतियों से वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा। आरती और 56 भोग महाप्रसाद वितरण के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ।

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