108 प्रकार की वन भाजी महोत्सव: छकतला में दिखा आदिवासी संस्कृति, स्वाद और पर्यावरण चेतना का अनूठा संगम

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ब्रजेश श्रीवास्तव, छकतला

ग्राम जामली (छकतला) के पास आदिवासी संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक चेतना को समर्पित एक अनूठे “108 प्रकार की वन भाजी महोत्सव” का आयोजन किया गया। इस भव्य कार्यक्रम में क्षेत्र के 20 गांवों से आई महिलाओं ने अपनी मधुर पारंपरिक संस्कृति की झलक पेश की।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विधायक प्रतिनिधि दिलीप चौहान व आदिवासी जन उत्थान ट्रस्ट भेकडिया(गुजरात) के संस्थापक रतन भगत उपस्थित रहे।

इस महोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि 20 गांवों से आई 108 महिलाओं ने अपनी पारंपरिक वेश-भूषा में शिरकत की। सभी महिलाएं अपने-अपने क्षेत्रों की विशेष वन भाजी व रोटियां स्वयं बनाकर लाई थीं। इसके साथ ही वे अपने घरों से पारंपरिक रूप से तैयार दो या तीन तरह का टिफिन भी साथ लेकर आईं, जिसके कारण कार्यक्रम में सामूहिक भोजन और सामूहिक एकता का अद्भुत नजारा देखने को मिला।

कार्यक्रम के दौरान अतिथियों और उपस्थित ग्रामीणों ने समाज सुधार और पर्यावरण को लेकर गंभीर विमर्श किया। जिसमें मुख्य रूप से निम्न बिन्दुओं पर चर्चा हुई –
*1. नशा मुक्ति:* युवाओं को नशे की लत से दूर रखकर समाज को एक नई और सही दिशा देने की अपील की गई।
*2. जल संरक्षण:* गिरते भूजल स्तर को बचाने और पानी की हर बूंद को सहेजने पर जोर दिया गया।
*3. वृक्षारोपण:* प्रकृति के संतुलन और वन संपदा को सुरक्षित रखने के लिए बड़े पैमाने पर पौधे लगाने का संकल्प लिया गया।

इस प्रकार से अतिथियों ने इस आयोजन की सराहना की। अतिथि एवं वक्ता  प्रवीण चौहान जिला समन्वयक (पेसा एक्ट), नरिन मोरी, मधुसुदन राठवा (गुजरात) ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि वन भाजियों का यह महोत्सव हमारी पुरानी धरोहर, शुद्ध खान-पान और प्रकृति के प्रति आदिम संस्कृति को जीवित रखने का एक अनूठा प्रयास है।

इस “108 प्रकार की वन भाजी महोत्सव” में लालसिंग निगवाल, कादुसिंह डोडवे, श्रवणसिंह चौहान, उगेश मोरी, उमेश पड़ियार, सरपंच मनु चौधरी, नागरसिंह कलेश, गोविंद कोठारी, देवसिंह चौहान शिक्षक, सहित बड़ी संख्या में ग्रामवासी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का मंच संचालन कांग्रेस नरगांवा ने किया, स्वागत भाषण गाँव के पटेल वगेसिंह दादा ने दिया एवं आभार  संजय भयड़िया ने माना। कार्यक्रम के अंत में 20 गांवों से आने वाली 108 महिलाओं को पुरस्कार स्वरूप पारंपरिक चार-चार पौधे (नींबू, आम, गोंदी, जामुन) देकर एवं एक-एक साड़ी भेंट कर सभी माता-बहनों को सम्मानित किया गया।

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