आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का बड़ा फैसला: 1 अप्रैल से ‘पोषण ट्रैकर’ ऐप का बहिष्कार, अब केवल ऑफलाइन होगा काम

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​आलीराजपुर। देश की लाखों आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। अखिल भारतीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता महासंघ के राष्ट्रीय आह्वान पर, आगामी 1 अप्रैल से देशभर के सभी जिलों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने ‘पोषण ट्रैकर’ ऐप पर काम पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया है।

सेवाएं जारी रहेंगी, पर डिजिटल माध्यम से नहीं

​कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वे काम बंद नहीं कर रही हैं, बल्कि ‘संपर्क ऐप’ और ‘ऑफलाइन’ माध्यम से अपनी सेवाएं देंगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गांव की महिलाओं और बच्चों को आंगनवाड़ी की योजनाओं और प्रदेश सरकार के लाभ मिलते रहें, लेकिन केंद्र के डिजिटल पोर्टल पर कोई डेटा दर्ज नहीं किया जाएगा।

प्रमुख मांगें और आक्रोश

प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य मंजुला लोहार ने सरकार की नीतियों पर कड़े सवाल उठाते हुए कार्यकर्ताओं का पक्ष रखा:

1.​नियमितीकरण की मांग:  पिछले 50 वर्षों से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल अल्प ‘मानदेय’ पर काम कर रही हैं। मांग है कि उन्हें अन्य सरकारी कर्मचारियों की तरह नियमित किया जाए और सभी सरकारी सुविधाएं दी जाएं।

​2. 2018 के बाद से कोई बढ़ोतरी नहीं: केंद्र सरकार ने आखिरी बार 2018 में मानदेय बढ़ाया था। तब से आज तक महंगाई आसमान छू रही है, लेकिन कार्यकर्ताओं की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

3.​अन्य विभागों का काम: आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से केवल अपने विभाग का ही नहीं, बल्कि अन्य सरकारी विभागों के सर्वे और ड्यूटी भी करवाई जाती है।

​”सरकार कर रही है सौतेला व्यवहार” — मंजुला लोहार

​मंजुला लोहार ने तीखे शब्दों में कहा कि सरकार कार्यकर्ताओं के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। उन्होंने तर्क दिया: ​”जब सरकार हमसे हर विभाग का पूरा काम ले रही है, तो हमें ‘कर्मचारी’ का दर्जा देने में इतनी देरी क्यों? मानदेय के नाम पर यह शोषण अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम काम बराबर कर रहे हैं, तो अधिकार भी बराबर चाहिए।”

क्या होगा असर?

​1 अप्रैल से पोषण ट्रैकर ऐप बंद होने से केंद्र सरकार की डिजिटल मॉनिटरिंग पूरी तरह ठप हो सकती है। महासंघ का यह कदम सरकार पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति है ताकि 50 वर्षों से लंबित मांगों पर ठोस निर्णय लिया जा सके। ​अब गेंद सरकार के पाले में है—क्या वह ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना देखने वाली इन जमीनी कार्यकर्ताओं की सुध लेगी या यह आंदोलन और उग्र होगा?

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