श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाई गई शीतला सप्तमी, बासी भोजन से महकी रसोई

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जीवन लाल राठौड़, सारंगी

आरोग्य की देवी मां शीतला की आराधना का पावन पर्व शीतला सप्तमी पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में लोक परंपराओं का सुंदर दृश्य देखने को मिला। महिलाओं ने विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की।

पर्व की शुरुआत एक दिन पूर्व षष्ठी से ही हो गई थी। इस दिन महिलाओं ने घरों में श्रद्धाभाव से विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान और व्यंजन तैयार किए। परंपरा के अनुसार सप्तमी की अलसुबह महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर, हाथों में पूजा की थाली लेकर और माता के भजन गाते हुए मंदिर पहुंचीं, जहां उन्होंने मां शीतला को एक दिन पूर्व बने बासी भोजन का नैवेद्य अर्पित किया।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा जलाना वर्जित माना जाता है। इसलिए सभी परिवारों ने माता को भोग लगाने के बाद स्वयं भी बासी भोजन, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बसौड़ा’ कहा जाता है, का सेवन किया।

इस परंपरा के पीछे स्वास्थ्य से जुड़ा दृष्टिकोण भी माना जाता है। मान्यता है कि सर्दी के विदा होने और गर्मी के आगमन के इस संधिकाल में शीतल भोजन करने से शरीर का तापमान संतुलित रहता है और मौसमी बीमारियों से बचाव होता है।

क्षेत्र के शीतला माता मंदिरों में इस अवसर पर विशेष रौनक देखने को मिली। मंदिरों में आकर्षक सजावट की गई और सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ माता के दर्शन के लिए उमड़ती रही।

विशेष रूप से प्रजापत समाज की आराध्य देवी के रूप में पूजित मां शीतला के प्रति ग्रामीण क्षेत्रों में गहरी आस्था देखने को मिलती है। होलिका दहन के बाद से सप्तमी तक सात दिनों तक महिलाएं प्रतिदिन मंदिर पहुंचकर जल अर्पित करती हैं और क्षेत्र को रोगों व संकटों से मुक्त रखने की प्रार्थना करती हैं।

इस दौरान कई पारंपरिक नियमों का भी पालन किया जाता है। बुजुर्गों के अनुसार इन दिनों गर्म पानी से स्नान नहीं किया जाता और पुरुष दाढ़ी-बाल नहीं बनवाते। इस प्रकार लोक आस्था और परंपराओं से जुड़ा यह पर्व क्षेत्र के जनजीवन में श्रद्धा, विश्वास और स्वास्थ्य का संदेश देता है।

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