झाबुआ लाइव के लिए पारा से राज सरतालिया की रिपोर्ट

शनिवार को चार्तुमास प्रारभं होने के पहले दिन सुबह भक्तामर, गुरु गुण इक्कीसा , गौतम इक्कीसा, गुरु गुणानुवाद के बाद जयंत सुरी इक्कीसा पाठ के साथ जैन समाज में तपस्वीयों और श्रावक – श्राविकाओं ने मंदिरजी मे अपनी धार्मिक क्रियाएं शुरु कर दी। प्रातः प्रक्षाल का लाभ मनोरमा मनोहरलाल कर्नावट परिवार, ब्रास पुजा मनोहरलाल छाजेड परिवार केशर पुजा सुरेश कोठारी परिवार , पुष्प पुजा राजेश कोठारी परिवार तथा जयंत सेन सूरी जी की आरती शांतिलाल कोठारी परिवार ने लिया।

उत्तदंड पुजा की
शनिवार को नव निर्माणाधीन गुरू मंदिर मे गुरूदेव के गंभारे के तीनो ठ्ठार की उत्तदंड पुजा साध्वी रत्ना अविचलद्रष्टाश्रीजी के साथ उपस्थित सभी लोगो ने 13 नवकार मंत्र के जाप के साथ की। नवनिर्माणाधीन गुरूमंदिर के गंभारे के मुख्य तीनो द्वारो पर विधि विधान से पुजा अर्चना कर शुभ मुर्हुत मे कुमकुम से स्वास्तिक व श्रीफल नेवेद्य , द्रव्य आदि से अष्टप्रकारी उत्तदंड की पुजन कर साध्वीजी ने मॉंगलिक सुनाई।
सुबह के इस कार्यक्रम के बाद साढ़े नौ बजे मंगल प्रवचन मे साध्वी रत्ना अविचलद्रष्टाश्रीजीमसा ने उपस्थित श्रावक – श्राविकाओं को जमीकंद तथा रात्रि भोजन के त्याग का महत्व बताते चौदस पर 50 उपवास के, 60 आयंबिल व एकासने के तपस्वियों को पच्चखाण दिये। 5 श्रावकों एवं 25 श्राविकाओं द्वारा पौषध तप किया गया। साध्वीजी भगवंत ने पोषध क्रिया के बारे में बताते कहा कि पुरुषार्थ तो केवल धर्म में ही करणीय होता है। संसार में चार पुरुषार्थ कहे गए हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें सबसे पहला स्थान धर्म का है। धर्म से ही अर्थ, काम या मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए करने जैसा पुरुषार्थ एक ही है और वो है धर्म। सवाल यह है कि आप धर्म किस अपेक्षा से कर रहे हैं। अर्थ – काम की प्राप्ति के लिए या मोक्ष की प्राप्ति के लिए। कदाचित आप धर्म नहीं कर रहे हैं, तब आपको जो अर्थ और काम की शक्ति प्राप्त है, वह पूर्व जन्मों के अर्जित पुण्य के फलस्वरूप है और उसी अर्थ व काम को बढाने के लिए ही पुरुषार्थ है, तो उसकी प्राप्ति की सीमा वहीं तक है, जहां तक आपका पूर्व कृत पुण्य शेष है, जिस दिन आपका पुण्य का खाता पूरा हो गया, सारा खेल खत्म और फिर महादुःख का प्रारंभ तय है। लेकिन यदि आप धर्म भी साथ-साथ कर रहे हैं तब यह सवाल खडा होगा कि यह धर्म आप किस अपेक्षा से कर रहे हैं। अर्थ, काम आदि लौकीक सुखों की प्राप्ति के लिए या देवगति और स्वर्गीय सुख प्राप्ति की कामना से किए गए धर्म से भी पुण्य तो अर्जित होता है लेकिन यह पापानुबंधी पुण्य है। इससे कदाचित आपको अर्थ, काम या देवगति तो प्राप्त हो जाएंगे लेकिन जुगनू की चमक की तरह। पहले सुखाभास और फिर महादुःख। यह विष मिश्रित दूध की तरह है। जिसमें मिश्री और बादाम आदि हैं और पीने में स्वादिष्ट लगता है, किन्तु विष का प्रभाव होते ही महावेदना और मौत होती है। अर्थ- काम अनर्थकारी हैं। इनके लिए धर्म नहीं होता, धर्म तो मोक्ष का साधन है। मोक्ष की भावना से या निराशंस भाव से धर्म करने का ही ज्ञानी विधान करते है। दोपहर में नवकार भवन मे सामुहिक आयंबिल की तपस्या हुई। इसके बाद महिलाओं ने सामायिक की।

तपस्याओं की लगेगी झड़ी

प्रचारमंत्री सुशील छाजेड़ ने बताया कि पारा में साध्वीजी भगवंत के चार्तुमास में तपस्याओं की झड़ी लगेगी। जिसमें 16 जुलाई से 44 दिनी सिद्धि तप, 17 जुलाई से शंखेश्वर पार्श्वनाथ के तेले तथा 30 जुलाई से नवकार महामंत्र की तपस्या प्रारंभ की जाएगी।

चोमासी पक्खी प्रतिक्रमण हुआ
शनिवार को चार्तुमास के पहले दिन शाम को सकलार्हत एवं अतिचार सुत्र बोल कर 84 लाख जीवों से क्षमा याचना की गई। इसके पूर्व पुरे दिन सुश्रावक अशोक छाजेड़ एवं राजेंद्र कोठारी ने धार्मिक क्रियाएं संपंन करवाए।

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