photo-01झाबुआ। झाबुआ स्टेट की राजमाता मधुर स्वभाव की थी, मिलनसारी होने के कारण उन्हें पूरे मालवा प्रांत मे जाना-जाता था। नेपाल में जन्म होने एवं मालवा मे विवाह होने के कारण उनकी पूरे प्रांत में विशिष्ट पहचान थी। राजमाता के चले जाने से एक युग का अंत हो गया है। वे झाबुआ आती थी, राजपूत समाज की महिलाओं के अलावा पूरे शहर से उनका विशेष लगाव रहता था। उक्त बात केके त्रिवेदी ने झाबुआ की राजमाता लोक राज लक्ष्मीदेवी को श्रद्धांजलि देते हुए कहीं। उल्लेखनीय है कि 31 जुलाई को रात्रि 9 बजे इंदौर मे राज माता का देवलोक गमन हो गया था। अंतिम संस्कार इंदौर में किया गया। मुखाग्नि राजमाता के जयेष्ठ पुत्र झाबुआ दरबार श्रीमंत नरेन्द्रसिंह द्वारा दी गई। राजमाता के पोत्र एवं नरेन्द्रसिंहजी के सुपुत्र युवराज कमलेन्द्रसिंह एवं जयसिंह ने परंपरागत रूप से अंतिम संस्कार करवाया। वर्तमान मंे झाबुआ का राज परिवार खंडवा रोड़ स्थित अजीत विला, कस्तूरबा ग्राम मंे विराजित है।
ऊंची सोच ने दिलाई ख्याति
सभा को संबोधित करते हुए साहित्यकार मांगीलाल सोलंकी ने बताया कि राजमाता इतनी सरल स्वभाव की थी कि उनमें मिलने के बाद ही ऐसा लगता ही नहीं था कि वह इतने बड़े औधे पर विराजमान है। राजवंश की होने की बावजूद वे सभी से सहज रूप से मिलती थी। झाबुआ राजवाड़ा के हाउस होल्ड आॅफिसर नानालाल कोठारी ने कहा कि राजामाता से उन्हें बच्चों जैसा ही अभूतपूर्व प्रेम मिला है, जिसे कभी भूलाया नहीं जा सकता है। राज परिवार से जुड़े भेरूसिंह राठौर ने कहा कि राजमाता जैसे बिरला व्यक्तित्व अब मिलना मुश्किल है। उनमें सभी को अपना बनाने की क्षमता है। नीमा समाज के लक्ष्मीनारायण शाह ने कहा कि राजमाता से अनेकों बार मिलने का अवसर मिला, उनकी ऊंची सोच के सभी कायल थे। बोरी ठाकुर कीर्तिसिंह राठौर ने कहा कि राजमाता से हमारा घरोपा था। जब भी उनसे मिलते, कुछ ना कुछ सीखने को मिलता था। श्री राठौर ने पुराने वृतांत का ब्यौरा भी दिया। सुदामा मंडल के अजय रामावत ने कहा कि प्रेम एवं ममत्व भी जिती-जागती मिशाल थी राजमाता। रोटरी क्लब एवं जैन समाज के यशवंत भंडारी ने कहा कि बड़े समय से राज परिवार एवं अन्य लोगों के बीच जो दूरियां थी, उसे कम किया जाना चाहिए। राजमाता ने गरीब और अमीर मे कभी भेद नहीं किया, वे सभी को समान दृष्टि से देखती है। गायत्री परिवार की नलिनी बैरागी ने कहा कि राजमाता की याददाश्त काफी अच्छी थी। लंबे समय के बाद मिलने पर भी वे सभी को याद रखती है। पेंशनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रतनसिंह राठौर ने कहा कि राजमाता को की यादे अविस्मरणीय है, उन्हें कभी भूलाया नहीं जा सकता है। सभा का संचालन करते हुए नीरजसिंह राठौर ने कहा कि राजमाताजी दया एवं करूणा की सागर थी। उनसे मिलकर ऐसा लगता ही नहीं था कि वे किसी बड़े ओहदे पर है। ममत्व उनकी बातों में कूट-कूटकर भरा था। विभिन्न संस्थाओं के 150 प्रतिनिधियांे ने कैंडल जलाकर राजमाता को श्रद्धांजलि दी।

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