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गुजरात में शराबबंदी को पलीता लगाने और मुनाफा कमाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने एक नायाब तरीका विगत 5 साल पहले निकाला और उस पर अभी भी अमल जारी है। दरअसल गुजरात से सटे मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ और अलीराजपुर जिले में गुजरात की सीमा के समीप ऐसे आदिवासी गांवों में विदेशी शराब की दुकानें खोल दी गई, जहां के आदिवासी अधिकांश बीपीएल है यानी वे महंगी शराब पी ही नहीं सकते लेकिन यह गांव शिवराज सरकार को इसलिए ठीक लगे क्योंकि यहां से शराबबंदी वाला राज्य गुजरात 300 मीटर से 10 किमी की दूरी पर है और हैरत की बात यह है कि झाबुआ जिला मुख्यालय या अलीराजपुर जिला मुख्यालय जहां गैर-आदिवासियों की आबादी अधिक है और जनसंख्या ज्यादा है वहां की विदेशी शराब की दुकानों के मुकाबले गुजरात बॉर्डर के एक एक हजार से कम आदिवासी आबादी वाले गांवों की विदेशी शराब की दुकाने करोडों रुपए में गई है, तो कागज पर तो यहां का आदिवासी बदनाम हो रहा है कि विदेशी शराब करोड़ों की वह बीपीएल होकर भी पी जाता है लेकिन हकीकत में गुजरात बॉर्डर पर यह दुकाने इसलिए खोली गई है ताकी दुकानों तक परमिट और उसकी आड़ में शराब लाई जा सके और वहां से शराब अलग-अलग तरीकों से गुजरात भेज दी जाती है। मगर आबकारी के रिकॉर्ड में यह करोड़ों की शराब इन बीपीएल बहुल सीमावर्ती गांवों के आदिवासी पी जाते है झाबुआ जिले में पिटोल, वटठा, मदरानी, मांडली, मदरानी और काकनवानी गुजरात बॉर्डर पर खोली गई विदेशी शराब की दुकानें है तो अलीराजपुर मे सेजावाड़ा, चांदपुर, कठठीवाड़ा, उमराली, छकतला में यह दुकानें खोली गई है।