शैलेष कनेश, मथवाड़ मध्यप्रदेश के जिला अलीराजपुर की तहसील सोण्डवा अंतर्गत ग्राम बखतगढ़ में परिवारजनों का द्वितीय स्नेह सम्मेलन अत्यंत उत्साह, आत्मीयता और पारिवारिक एकता के वातावरण में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान से बड़ी संख्या में परिवारजन एकत्रित हुए। विभिन्न राज्यों में निवास करने के बावजूद सभी के बीच अपने पूर्वजों, पारिवारिक संबंधों, सांस्कृतिक परंपराओं और साझा विरासत के प्रति गहरा लगाव देखने को मिला। यह सम्मेलन केवल एक पारिवारिक मिलन समारोह नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों को पहचानने, बिछड़े हुए पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने तथा आने वाली पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक पहचान पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रहा। *चार राज्यों के परिवारजनों का आत्मीय संगम* महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश और राजस्थान से आए परिवारजनों की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष महत्व प्रदान किया। अलग-अलग राज्यों में रहने के कारण भाषा, बोली, रहन-सहन, खान-पान और दैनिक जीवन की परंपराओं में भिन्नताएं स्वाभाविक हैं, लेकिन इन विविधताओं के बीच पारिवारिक अपनत्व और सांस्कृतिक जुड़ाव की भावना सभी को एक सूत्र में बांधती दिखाई दी। सम्मेलन में परिवारजनों को एक-दूसरे से मिलने, परिचय बढ़ाने, आपसी अनुभव साझा करने और पारिवारिक संबंधों को नई ऊर्जा देने का अवसर प्राप्त हुआ। ऐसे आयोजन परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के अनुभवों और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के बीच संवाद का सशक्त माध्यम बनते हैं। *रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का संकल्प* इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों, रहन-सहन, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का संकल्प रहा। परिवारजनों ने इस भावना को महत्व दिया कि आधुनिकता और बदलते समय के साथ आगे बढ़ते हुए भी अपनी मूल पहचान, परंपराओं और पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों को विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए। परिवार की वास्तविक समृद्धि केवल आर्थिक उन्नति में नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सहयोग, सम्मान, सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में भी निहित है। जब परिवार अपनी परंपराओं को समझता है और अगली पीढ़ी को उनसे परिचित कराता है, तभी उसकी सांस्कृतिक विरासत निरंतर आगे बढ़ती है। *नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की पहल* आज के समय में शिक्षा, रोजगार और व्यवसाय के कारण परिवारों के सदस्य अलग-अलग शहरों और राज्यों में निवास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में नई पीढ़ी का अपने परिवार के इतिहास, पूर्वजों, पारंपरिक रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन से परिचित रहना अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार के स्नेह सम्मेलन बच्चों और युवाओं को अपने परिवार के व्यापक स्वरूप को समझने, वरिष्ठजनों से अनुभव प्राप्त करने तथा अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अवसर प्रदान करते हैं। साथ ही, परिवार के सदस्यों के बीच संवाद, सहयोग और आपसी विश्वास को मजबूत करने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। *पारिवारिक एकता का संदेश* ग्राम बखतगढ़ में आयोजित द्वितीय स्नेह सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि भौगोलिक दूरियां पारिवारिक आत्मीयता को कमजोर नहीं कर सकतीं, यदि सभी के मन में एक-दूसरे के प्रति सम्मान, प्रेम और जुड़ाव की भावना बनी रहे। ऐसे आयोजन परिवार के वर्तमान सदस्यों को एक-दूसरे के करीब लाने के साथ-साथ भविष्य में भी सामूहिक रूप से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। सम्मेलन में व्यक्त भावनाओं और संकल्पों का वास्तविक महत्व तभी और बढ़ेगा, जब उन्हें दैनिक जीवन में अपनाया जाएगा तथा पारिवारिक मेल-मिलाप की इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया जाएगा। भविष्य के लिए संकल्प *इस स्नेह सम्मेलन की भावना के अनुरूप निम्नलिखित उद्देश्यों को आगे बढ़ाना उपयोगी रहेगा—* परिवारजनों के बीच नियमित संपर्क और आपसी संवाद बनाए रखना। पारंपरिक रीति-रिवाजों, बोली, खान-पान और रहन-सहन की विशेषताओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना। परिवार के वरिष्ठजनों के अनुभवों, पूर्वजों की स्मृतियों और पारिवारिक इतिहास का संकलन करना। बच्चों और युवाओं को पारिवारिक परंपराओं, संस्कारों और सामाजिक उत्तरदायित्वों से परिचित कराना। सुख-दुःख, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक आवश्यकताओं के समय एक-दूसरे का सहयोग करना। भविष्य में भी नियमित रूप से स्नेह सम्मेलनों का आयोजन कर पारिवारिक एकता की परंपरा को मजबूत करना। Post navigation लोक अधिकार मंच संगठन ने विश्व आदिवासी दिवस पर आकडिया में बिज रोपण कार्य कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया