भूपेंद्र नायक, पिटोल

झाबुआ जिले के अंचलों में भगोरिया, होली और धुलेंडी के साथ-साथ गल देवता की पूजा के त्योहार भी चल रहे हैं। पिटोल नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कल रात होलिका दहन के बाद, आज प्रतिवर्ष की तरह गल देवता की पूजा का आयोजन किया गया। पिटोल के साथ ही आसपास के करीब 20 गांवों के हजारों ग्रामीणों ने गल देवता की पूजा-अर्चना की और ढोल-मांदल की थाप पर नृत्य करते हुए धूमधाम से इस त्योहार का आनंद लिया।

पिटोल में स्थानीय बस स्टैंड के पास वर्षों पुराना गल देवता का स्थान है। दोपहर 2 बजे से शाम 5:30 बजे तक चले इस धार्मिक अनुष्ठान में हजारों लोगों ने शिरकत की। श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी होने पर गल देवता की पूजा करने और मन्नत उतारने के लिए अपने परिजनों के साथ पिटोल पहुंचे।

कठोर नियमों का होता है पालन

होली से पहले गल देवता की परंपरा के तहत मन्नतधारी 7 दिनों तक कठोर नियमों का पालन करते हैं, जिनमें हल्दी का लेप लगाना, उपवास रखना और नंगे पैर रहना शामिल है। गल देवता की पूजा मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (विशेषकर झाबुआ) के आदिवासी समुदाय द्वारा होली के आसपास, मन्नत पूरी होने पर की जाती है। इस अनोखी परंपरा में 20-50 फीट ऊंचे मचान पर उल्टा लटककर 5-7 परिक्रमाएं की जाती हैं।

गल देवता पूजा की मुख्य बातें:

  • उद्देश्य: बीमारी, आर्थिक तंगी दूर होने या संतान प्राप्ति जैसी मन्नतें पूरी होने पर यह पूजा की जाती है।

  • समय: होली के आसपास, मुख्य रूप से धुलेंडी के बाद।

  • वेशभूषा और पूजन सामग्री: मन्नतधारी लाल और सफेद कपड़े पहनते हैं। वे हल्दी-कुमकुम लगाते हैं, उपवास रखते हैं और हाथों में नारियल, कांच तथा कंघा लेकर गल देवता की पूजा करते हैं। आदिवासी समुदाय में पूजा के दौरान पशु बलि की प्रथा भी प्रचलित है।

  • मान्यता: गल देवता को भगवान शिव का रूप माना जाता है, जिनसे मन्नत पूरी करने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह पूजा एक अत्यंत साहसी और आस्था पर आधारित अनुष्ठान है, जो स्थानीय निवासियों के गहरे विश्वास का प्रतीक है।

ढोल-मांदल के साथ पहुंचते हैं मन्नतधारी, लगता है मेला

गल देवता के अनुष्ठान के दिन मन्नतधारी (जिन्हें लाड़ा कहा जाता है) अपने परिजनों और इष्ट-मित्रों के साथ जुलूस के रूप में गल स्थल तक पहुंचते हैं। ढोल-मांदल की थाप, नृत्य और जयकारों के बीच पूरा धार्मिक वातावरण एक बड़े उत्सव में बदल जाता है। पिटोल क्षेत्र इस परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस अवसर पर यहां मेले जैसा दृश्य बन जाता है—दुकानें सजती हैं, झूले और चकरियां लगती हैं, और बड़ी संख्या में लोग इस अनुष्ठान को देखने पहुंचते हैं। झाबुआ के आदिवासी समाज के लिए गल केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह परंपरा, पहचान और सामुदायिक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। धुलेंडी के दिन जब ‘लाड़ा’ 30 फीट ऊपर उल्टा लटककर हवा में परिक्रमा करता है, तब आस्था सचमुच आसमान को छूती दिखाई देती है।

पुलिस प्रशासन ने शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराया त्योहार

मंगलवार को पिटोल में साप्ताहिक हाट बाजार के साथ-साथ गल देवता की पूजा का भी आयोजन था। हाट बाजार और गल देवता के मेले के कारण पिटोल में भारी भीड़ उमड़ी, जो पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती थी। हालांकि, पिटोल चौकी प्रभारी अशोक बघेल ने अपने स्टाफ और स्थानीय कोटवारों के सहयोग से पूरी व्यवस्था को बेहतरीन तरीके से संभाला और इस आयोजन को शांतिपूर्ण व निर्विघ्न रूप से संपन्न कराया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *