महीनों से जंगल में पड़े शीशम के लट्ठे, कार्रवाई के नाम पर अब नंबरिंग

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गोपाल राठौड़, कट्ठीवाड़ा

वन परिक्षेत्र कट्ठीवाड़ा के अंतर्गत ग्राम मोटीवार स्थित बीट क्रमांक 188 में शीशम के पेड़ों की अवैध कटाई का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि तीन से चार शीशम के पेड़ कुछ महीने पहले काटे गए थे, लेकिन कटे हुए पेड़ों के लट्ठे लंबे समय बाद भी जंगल में पड़े हुए थे जिन्हें आज 4 अक्टूबर को डीपो मे लाया गया। इससे वन विभाग की कार्यप्रणाली और कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

मामले की पड़ताल के लिए जब CB Live की टीम मौके पर पहुंची तो वहां एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। मौके पर वन विभाग के बिट गार्ड द्वारा काटे गए शीशम के लट्ठों पर क्रमांक अंकित किए जा रहे थे। जब बिट गार्ड से इस संबंध में सवाल किया गया तो उनका कहना था कि इन पेड़ों को तस्करों को पकड़ने के लिए मौके पर ही छोड़ा गया था।

तस्करों को पकड़ने के लिए लट्ठे छोड़े तो कार्रवाई कब?

वन विभाग के इस तर्क के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कटे हुए पेड़ों को तस्करों तक पहुंचने के लिए मौके पर छोड़ा गया था, तो इतने महीनों में विभाग ने क्या कार्रवाई की? या मामले में पंचनामा और पीआर समय पर दर्ज की गई?

प्रभारी रेंजर ने कहा- पीआर काट दी गई

मामले को लेकर जब CB Live ने कट्ठीवाड़ा के प्रभारी रेंजर सत्येंद्र सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि पेड़ों की कटाई हुई है और उनकी पीआर काट दी गई है। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि पीआर किस तारीख को काटी गई और मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई? तो प्रभारी रेंजर ने कहा कि वे रिकॉर्ड देखकर जानकारी बताएंगे। यहीं से मामले में एक और सवाल खड़ा होता है—यदि पीआर पहले ही काट दी गई थी तो मौके पर पहुंचने के समय लट्ठों पर क्रमांक अंकित करने की कार्रवाई क्यों की जा रही थी?

मामला दबाने की कोशिश या विभागीय प्रक्रिया?

स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं मामला लंबा खिंचने के कारण इसे रफा-दफा करने का प्रयास तो नहीं किया गया। हालांकि इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच और विभागीय रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही निकाला जा सकता है।

CB Live के 4 सवाल

1. शीशम के पेड़ आखिर किस तारीख को काटे गए थे?

2. वन विभाग को घटना की जानकारी कब मिली?

3. पीआर किस तारीख को दर्ज की गई और उसका क्रमांक क्या है?

4. महीनों तक जंगल में पड़े लट्ठों की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी?

अब देखना यह है कि वन विभाग इन सवालों के जवाब दस्तावेजों के साथ कब तक सामने रखता है।

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