एवी पठान, झाबुआ

आज मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2019 के द्वितीय प्रश्न पत्र ” सामान्य अधिरुचि परीक्षण ” में मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति भील का अपमान किया गया। दरअसल, प्रश्न पत्र में एक गद्यांश भील जनजाति पर दिया गया था जिसमें भील जनजाति को शराब का आदी व अनैतिक कार्यों में लिप्त बताया गया है। इस गद्यांश में लिखा गया है कि भील एक निर्धन जनजाति है और इसका मुख्य व्यवसाय कृषि है। गद्यांश 4 के इस अंश में लिखा गया है कि भील खेतों में मजदूरी, पशुपालन, जंगली वस्तुओं का विक्रय तथा शहरों में भवन निर्माण में दिहाड़ी मजदूरी पर काम कर अपनी जीवन नैया चलाते हैं। लोक सेवा आयोग ने इसी गद्यांश में आगे लिखा कि भीलों की आर्थिक विपन्नता का एक प्रमुख कारण आय से अधिक व्यय करना है। भील वधू मूल्य रूपी पत्थर से बंधी शराब के अथासागर में डूबती जा रही जनजाति है, ऊपर से साहूकारों, महाजनों द्वारा दिए गए ऋण बढ़ता ब्याज इस समंदर में बवंडर का काम करता है, जिसके दुष्चक्र से यह लोग कभी बाहर नहीं निकल पाते। भीलों की आपराधिक प्रवृत्ति का भी एक प्रमुख कारण है कि सामान्य आय से अपनी देनदारियां पूरी नहीं कर पाते, फलत: धन उपार्जन की आशा में गैर वैधानिक तथा अनैतिक कामों में संलिप्त हो जाते हैं। दरअसल, यह गद्यांश का हिस्सा सी-नंबर के सेट में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब के लिए परीक्षार्थियों के लिए लिखा गया था जिसमें प्रश्न नंबर 99 में सवाल ही ऐसा दागा जिससे मध्यप्रदेश की यह सबसे बड़ी जनजाति को अपराधी जनजाति घोषित कर दिया गया। सवाल नंबर 99 में पूछा गया कि भीलों की आपराधिक प्रवृत्ति का एक मुख्य कारण क्या है? साथ ही 100 नंबर के सवाल में यह पूछा गया कि धना उपार्जन के लिए भील कैसे कामों में संलिप्त हो जाते हैं? देर शाम यह मामला संज्ञान में आने के बाद हड़कंप मच गया तथा अब लोग सोशल मीडिया पर इसकी प्रतिक्रियाएं देने लगे हैं।

निर्णय क्षमता के लिए होता है प्रश्न पत्र-

दरअसल, राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा के लिए नियमों के मुताबिक आज जो दूसरा पेपर हुआ, वह दोपहर 2 से 4 बजे के बीच हुआ था। इस प्रश्न पत्र में अनारक्षित प्रतिभागियों को 40 नंबर तथा अनुसूचित जाति-जनजातियों के प्रतिभागियों को 30 नंबर लाना होता है। इस प्रश्न पत्र के जरिये परीक्षार्थियों के निर्णय क्षमता को आंका जाता है। अब सवाल उठता है कि जब अधिकारियों की नियुक्ति करने वाला आयोग ही निर्णय क्षमता के प्रश्न पत्र में मध्यप्रदेश की एक बड़ी जनजाति को आपराधिक घोषित करेगा और उनकी गलत व्याख्या करेगा तो भावी प्रशासनिक अधिकारियों के मन में आदिवासियों के प्रति पूर्वाग्रह की स्थिति निर्मित नहीं होगी…? स्वाभाविक तौर पर आयोग ने अपने प्रश्न पत्र में इस तरह के कुंठित सवाल और गद्यांश को लिखकर एक तरह से एसटी-एससी एक्ट का उल्लंघन नहीं किया है..? गौरतलब है कि मप्र में सबसे ज्यादा आबादी भीलों की है।

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