संजय गांधी, बोरी
एक तरफ जहां सरकार ‘पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया’ और ‘सर्व शिक्षा अभियान’ जैसे नारों पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। अलीराजपुर जिले के उदयगढ़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम पाटबयडी से कुछ ऐसी खौफनाक तस्वीरें सामने आई हैं, जो किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर कर रख देंगी। यहां की प्राथमिक शाला की इमारत आज एक बड़े हादसे का इंतजार कर रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, स्कूल भवन की आधी छत से प्लास्टर पूरी तरह से गिर चुका है। सीमेंट और कंक्रीट का हिस्सा उखड़ कर नीचे गिर चुका है और छत के भीतर से झांकते लोहे के जंग लगे सरिये अब सीधे तौर पर आने वाले समय में होने वाले किसी भयानक हादसे की खुली चेतावनी दे रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और शिक्षा विभाग शायद तब तक नहीं जागता जब तक कोई गंभीर अप्रिय घटना न घट जाए। सवाल यह है कि क्या मासूमों की बलि चढ़ने के बाद ही व्यवस्थाएं दुरुस्त होंगी? सबसे ज्यादा चौंकाने वाली और आश्चर्य की बात यह है कि यह प्राथमिक विद्यालय किसी दूरस्थ ग्रामीण अंचल या बीहड़ में नहीं है, बल्कि यह सीधे बोरी पारा मुख्य मार्ग पर स्थित है।

अधिकारियों की आंखों पर बंधी है पट्टी
इस बोरी पारा मुख्य मार्ग से हर रोज प्रशासनिक अमले, शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों के वाहनों का काफिला गुजरता है। इसके बावजूद किसी भी जिम्मेदार अधिकारी की नजर इस जर्जर और जानलेवा हो चुके स्कूल भवन पर नहीं पड़ी है, जो व्यवस्था की घोर लापरवाही को दर्शाता है।
हर पल बना रहता है अनहोनी का डर
वर्तमान में इस शासकीय प्राथमिक विद्यालय में कुल 80 बच्चे अध्ययनरत हैं। ये मासूम बच्चे और उनके शिक्षक हर दिन एक अदृश्य डर और मौत के साए के बीच इस परिसर में बैठने को मजबूर हैं। अभिभावकों का कहना है कि वे हर सुबह अपने बच्चों को भारी मन से स्कूल भेजते हैं, क्योंकि स्कूल की जर्जर छत को देखकर हमेशा अनहोनी की आशंका बनी रहती है।
मरम्मत के नाम पर जारी होते हैं लाखों रुपए
ग्रामीणों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि कई बार मौखिक रूप से ध्यान आकर्षित कराने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। मुख्य मार्ग पर होने के बाद भी इस ओर ध्यान न देना यह साफ करता है कि अधिकारियों के लिए गरीब और ग्रामीण बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा कितनी कम प्राथमिकता रखता है। बंद गाड़ियां और उनके काले शीशे शायद बाहर की इस खौफनाक सच्चाई को देखने की फुर्सत नहीं देते, जबकि हकीकत यह है कि स्कूल मरम्मत के नाम पर हर वर्ष लाखों रुपए सरकारी खजाने से जारी हो रहे हैं। ग्रामीण कैलाश चौहान ने बताया ग्राम के छोटे छोटे बच्चे इस स्कूल में पढ़ते है और ऐसी लापरवाही से किसी दिन कोई भी अनहोनी हो सकती है। अधिकारियों को समय रहते ध्यान देना चाहिए।
मामले में अध्यापक राजू सिंगाड से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा हमने सीएससी के माध्यम से लिखित सूचना अधिकारियों तक दे दी है लेकिन मरम्मत का पैसा नहीं आने से इसकी मरम्मत नहीं करवा सके है । वहीं सीएससी राघुसिंह मसानिया से जब संपर्क करना चाहा तो उन्होंने मोबाइल रिसीव नहीं किया।