अलौकिक छटा बिखेर रही है देवीगढ़ स्वयंभू माता मंदिर, दर्शनार्थियों का लगता है तांता

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रितेश गुप्ता, थांदला
थांदला – मुख्यालय से 5 किमी दूर ग्राम देवीगढ में स्वयं भू-माता का मन्दिर पदमावती नदी के तट पर स्थित ऊंची पहाडी पर स्थित है यहां का प्राकृतिक सौंदर्य व अलौकिक छटा सभी को अपनी और आकर्षित करती है। प्राचीन समय से ही उक्त स्थान की अंचल सहीत मप्र सीमावर्ती गुजरात व राजस्थान के सूदूर ग्रामों तक ख्याति है बडी संख्या में श्रृद्धालु माता के दर्शन हेतु देवीगढ़ आते है, नवरात्रि में यह संख्या बढ जाती है। वही चैत्र नवरात्रि में अंचल का प्रसिद्ध स्वयं भू-माता का मेला भी लगता है जिसमें लाखों लोग सम्मिलित होते है। अंचल में इसे छोटी पावागढ के नाम से भी जाना जाता है। मन्दिर की प्राचीनता पूर्णत: जनश्रुति पर आधारित है प्रचलित किवंदती अनुसार नदी के उत्तरी तट पर प्राचीनकाल में कुलम्बी पाटीदार समाज प्रतिवर्ष बैलगाडिय़ों मे खाना पीने का सामान लाद कर पावागढ देवी दर्शनार्थ जाया करते थे बैलगाडियों को स्थानीय आदिवासी समुदाय के लोग जो की पाटीदारों के यहां हालीपना कृषि मजदूरी के रूप में कार्य करते थे वे ही यात्रा करवाते थे। यात्रा तद्समय के आवागमन के दुर्गम रास्तों के कारण काफी कठिन मानी जाती थी। बैलगाडी चलाने वाले आदिवासी मजदूर भी बडी श्रद्धा भाव से यात्रा के साथ जाते थे।इन्ही में से स्थानीय सिंगाडिया परिवार का एक व्यक्ति जो इस वर्षो से इस कार्य को करता था वृद्धावस्था में होने से उसने पावागढ़वाली माता से प्रार्थना की माता अब मेरी शक्ति आएं दा मेरे दर पर आने की नही हमारे गांव में भी पहाडी आप प्रकट होकर दर्शन दो हम टूटी-फूटी आपसी सेवा करेंगे। भक्त के वस में है भगवान की कहावत को चरितार्थ हुई और गांव के सिंगाडिया आदिवासी परिवार के लखा जी को चैत्र माह की चोदस को रात्रि में स्वप्न में माता ने आदेश दिया की मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं और पहाडी पर मेरा रूप तुझे दिखेगा । दूसरे दिन सुबह लखा सिंगाडिया ने स्वप्न की बात गांव में बताई और सभी गांव के लोग पहाडी पर गये देखा वहां माता की प्रतिमा विराजित है जिस पर सिंदूर लगा है। पूरे क्षेत्र में यह बात जंगल की आग की तरह फैली और दर्शनार्थियों का तांता लगना शुरू हो गया, उसके बाद से इस वनांचल के सीमावर्ती राजस्थान, गुजरात, व मालवा क्षेत्र से लोग बड़ी संख्या में आने लगे माताजी के अनेक चमत्का की घटनाएं हुई लोगो की मनोकामनाएं पूर्ति होने लगी और उसके बाद से ही यहां का सिंगाडिया आदिवासी परिवार पीढ़ीदर पीढी से माता की पूजा अर्चना करने लगा। कालान्तर में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार नवरात्रि में माताजी के गरबे होने लगे इसी बीच एक घटना हुई गरबों में माताजी स्वयं भेस बदलकर गरबा खेलती थी। गांव के किसी व्यक्ति व्दारा अजनबी महिला को गरबे खेलता देखकर बुरी नीयत रखते हुए उसे पीछा किया। मातारानी तो अदृश्य हो गई लेकिन उनके श्राप से देवीगढ़ ग्राम की सारी आबादी महामारी की चपेट में आ गई दिन में मकानों में आग की ज्वाला फैली यहां से गांव की आबादी घर छोड अपनी जान बचाने के लिये भाग निकले और दूर दराज के गांव में जाकर बसे। आज भी गांव में खेतों में प्राचीन आबादी के भग्नावशेष मौजूद है। क्षैत्र में दूर दराज फैले कुलम्बी पाटीदार जहां माताजी को अपनी इष्टदेवी मानते है और वर्ष भर विभिन्न अवसरों पर आकर अपनी परिवार की सुख शांति के लिए प्रार्थना करते है। वही सिंगाडिया परिवार व अंचल का आदिवासी इसे अपनी कुलदेवी इष्टदेव के रूप में मानते है। चूंकि माताजी की स्थापना चैत्र पूर्णिमा को मानी जाती है और यहॉ प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा को माताजी का विशाल मेला लगता है जिसमें सीमावर्ती राजस्थान के बांसवाडा, डूंगरपूर, गुजरात के पंचमहाल, झाबुआ,धार, रतलाम क्षैत्र से बडी संख्या में श्रद्धालु भक्त आते है। माताजी की ख्याति संभावित होकर कहाजाता है पूर्व मे मात्र पूर्णिमा को ही मेला लगता था। तत्कालीन झाबुआ के राजा उदयसिंग ने मेले की अवधि एक दिन से बढाकर 7 दिन की और राज्य की और से व्यापारियों को दूकाने लगाकर दी जाने लगी राजशाही समाप्ती उपरांत ग्राम पंचायत इस मेले को सम्पन्न करवाती है। गतवर्षो प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को आदिवासियों के इस तीर्थ स्थल के विकास एंव जनसुविधा किये जाने की मांग तत्कालीन विधायक कलसिंह भाभर व्दारा रखे जाने पर उनके व्दारा इसे पर्यटन स्थल घोषित करते हूए रुपए 20 लाख की राशि से मन्दिर के आगे विशाल सभागार का निर्माण किया गया लेकिन आज भी यहां यात्रियों श्रद्धालुओं की बढ़ती तादात को देखते हूए मूलभूल सुविधाओं का अभाव है यात्रीगण रात्रि में यहां रतजगा करते है जिनके लिए लेटबाथ की आवश्यकता के साथ सामुदायिक भवन एंव पहाडी पर हरियाली के लिए पौधारोपण की जरूरत है। वही मेला मैदान से मन्दिर तक विधुतीकरण, नदी पर घाट निर्माण व आगामन के रास्ते पर रेलिंग निर्माण होने से उक्त स्थल सर्वसुविधा को प्राप्त करेगा।

नवरात्री में विशेष आयोजन
चैत्र एवं शारदेय नवरात्री में यहा श्रद्धालुओं का ताता लगा रहता है। चेत्र नवरात्री के बाद की पुर्णिमा पर यहां मेले का भी आयोजन किया जाता है। षारदेय नवरात्री में यहां जप, पाठ, अनुष्ठान एवं रात्रि में ग्रामीणों द्वारा गरबा का आयोजन किया जाता है। नवरात्री की नवमी पर अनुष्ठान की हवनात्म पूर्णाहुति एवं महाप्रसादी का आयोजन किया जाता है।

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