मोहनखेड़ा तीर्थ प्रणेता मुनि मण्डल का थांदला में हुआ मंगल प्रवेश, मुनि पीयुषचंद्र बोले मायाचार करने वालों की दुर्गति निश्चित है

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रितेश गुप्ता, थांदला

मोहनखेड़ा तीर्थ प्रणेता जन जन के आस्था केंद्र प.पू. परोपकार सम्राट गुरुदेव आचार्य प्रवर श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्र सूरीश्वरजी म.सा. के वरिष्ठ शिष्य प.पू. मुनिराज पीयूषचन्द्र विजयजी म.सा., पूज्य मुनिराज  रजतचन्द्र विजय म. सा., मुनि जिनचंद्र विजयजी म. सा., मुनि श्री जीतचन्द्र विजय म. सा. एवं मुनि जनकचंद्र विजयजी म. सा. आदि ठाणा 5 का मंगल प्रवेश मेघनगर कि ओर से थांदला नगर में हुआ। श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ अध्यक्ष कमलेश जैन दायजी, प्रफुल्ल पोरवाल, अनोखीलाल मोदी, मयूर तलेरा, उमेश पीचा, मूलचन्द्र जैन सहित वरिष्ठ पदाधिकारियों व श्रीसंघ के अनेक श्रावक श्राविकाओं ने मुनि मण्डल की भव्य अगवानी की व पूरे मार्ग पर अपने निवास स्थान पर गवली कर उनके दर्शन वंदन कर जिन मन्दिर पर प्रवेश कराया। मुनि भगवन्तों ने जिन मन्दिर पर केसरियानाथ भगवान के दर्शन वंदन कर मधुर स्तवन के माध्यम से प्रभु भक्ति की। इस अवसर पर उपस्थित परिषद को धर्मलाभ देते हुए अपनी ओजस्वी वाणी से गुरुभगवन्त पूज्य श्रीपीयूषचंद्र विजयजी म.सा. ने गुरुदेव को स्मरण करते हुए फरमाया कि ऋषभविजयजी म.सा. के सकल जैन जेनेत्त्तर बन्धुओं पर अनन्त उपकार है जिन्हें कभी विस्मृत नही किया जा सकता व गुरु के उपकार को भुला कर जो उनकी निंदा करते है वे गुरु निंदा के भाजक होते है। मुनिश्री ने कहा कि कषाय संसार वृद्धि कारक होते है वही मायाचार करने से व्यक्ति हो या साधु कोई भी दुर्गति में जाने नही बच सकता इसलिए त्याग योग्य है। उन्होंने झाबुआ के ऐतिहासिक चातुर्मास का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरुदेव ऋषभविजयजी म.सा. का दिव्य आशीष उनकी शिष्य सम्पदा पर बरस रहा है जिससे वे हर प्रकार से संघ कि सेवा करने में सक्षम है व आगे भी संघ सेवा करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि गुरुदेव के हर सपनों को साकार करने की क्षमता गुरुदेव ने शिष्यों को दी है व उनके देवलोक में जाने के बाद उनका दिव्याशीष भी उनका पथ प्रदर्शन करता है जिससे हर कार्य सिद्ध हो जाते है इसलिए उनकी शिष्य सम्पदा को भी कमतर नही समझना चाहिए । मुनि श्री जिनचन्द्रसूरीश्र्वरजी ने अपने व्याख्यान में कहा कि जिन प्रतिमा, जिन आगम, जिन मन्दिर, साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका की सेवा में लगाया गया धन भक्ति है जबकि जीवदया के अन्य कार्य अनुकम्पा दान कहलाते है जिससे जीव का आत्मिक विकास होता है। उन्होंने कहा कि क्रोध प्रीति का नाश करता है, मान विनय का नाश करता है, माया मित्रता के लिए विनाशक है तो लोभ सभी गुणों का नाश करता है इसलिए इनसे बचकर प्रभु सेवा करते हुए अपने धन का सदुपयोग करना चाहिए। मुनि मण्डल दो दिन के अल्प प्रवास पर थांदला नगर में पधारें है। उन्होंने कहा कि उनके सांसारिक बुआ श्रीमती स्व. शकुंतला वर्धमान तलेरा के निधन के पश्चात उनके वात्सल्यमय भाव से उऋण होने तथा अन्य परिजन को मांगलिक व धर्म श्रवण की भावना तथा रतलाम जिलें में अन्य धार्मिक आयोजन में जाने के लिए अल्प प्रवास पर थांदला आना हुआ है। थांदला संघ एवं अन्य जनों की मंशा हुई तो गुरुदेव के सपनों को साकार करते हुए नगर में भव्य मंदिर निर्माण कराया जा सकता है। इस अवसर पर श्रीसंघ थांदला ने प्रभावना का वितरण कर बाहर से पधारें हुए अतिथियों की सेवा सत्कार का लाभ लिया।

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