विश्व आदिवासी दिवस पर उमड़ा जनसैलाब: परंपरा, आधुनिकता और जड़ों से जुड़ाव की अनूठी मिसाल

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संजय गाँधी, बोरी

आलीराजपुर के बोरी में विश्व आदिवासी दिवस के पावन अवसर पर जिले के बोरी ग्राम में एक ऐतिहासिक और भव्य जुलूस का आयोजन दशामाता चौक से किया गया। डीजे साउंड की धुन और मांदल की गूंज के साथ निकाले गए इस विशाल जुलूस में बोरी सहित आसपास के लगभग पचासों गांवों से सैकड़ों की संख्या में आदिवासी भाई-बहनों ने सहभागिता की। चारों ओर उत्साह, उमंग और अपनी संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम का माहौल नजर आ रहा था।

इस वृहद आयोजन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता विभिन्न राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों तथा सामाजिक संगठनों के प्रबुद्ध जनों की बड़ी संख्या में मौजूदगी रही। दलगत राजनीति और विचारधाराओं के मतभेदों से ऊपर उठकर सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता, स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता एक ही मंच पर, एक ही रंग में रंगे नज़र आए। आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और अधिकारों के संरक्षण के इस साझा मंच पर सभी ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर यह संदेश दिया कि जब समाज के गौरव और अस्तित्व की बात आती है, तब संपूर्ण समाज बिना किसी भेदभाव के एकसाथ खड़ा रहता है।

जुलूस का सबसे आकर्षक पहलू सांस्कृतिक विविधता और युवाओं का उत्साह रहा। एक ओर जहाँ पारंपरिक आदिवासी परिधानों में सजे-धजे युवक-युवतियाँ लोक धुनों पर थिरकते नजर आए, वहीं दूसरी ओर आधुनिक लिबास में शामिल युवाओं की उपस्थिति यह संदेश दे रही थी कि वे भले ही आधुनिकता की दौड़ में कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं, लेकिन अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और जीवन-मूल्यों से उनका जुड़ाव आज भी उतना ही अटूट है। आधुनिकता के रंग में ढलने के बावजूद अपनी जड़ों और प्रकृति-प्रेम को संजोए रखने का यह जज्बा हर किसी को आकर्षित कर रहा था।

इस जुलूस की एक और बड़ी विशेषता शिक्षित, बुद्धिजीवी और सरकारी व निजी सेवाओं में कार्यरत नौकरीपेशा वर्ग की बढ़-चढ़कर भागीदारी रही। आमतौर पर सार्वजनिक जुलूसों और आयोजनों से दूरी बनाए रखने वाला यह वर्ग जब अपनी लोक-संस्कृति के गौरव को नमन करने सड़कों पर उतरा, तो माहौल और भी गरिमामय हो गया। इस वर्ग की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि सफलता के चाहे किसी भी शिखर पर पहुँच जाएँ, अपनी माटी और संस्कृति से जुड़ाव हमेशा सर्वोपरि रहता है। किसी शायर की ये पंक्तियाँ आज के इस दृश्य पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं:

*भले छू लें  हम ,आसमां की ऊंचाइयां लेकिन,

पाँव हमे अब भी,जमीं पर रखना आता है।*

दिनभर चले इस आयोजन में एकता, समरसता और पर्यावरण संरक्षण की झलक साफ दिखाई दी। समाज के वरिष्ठों से लेकर युवाओं तक, सभी ने एक स्वर में अपनी गौरवशाली विरासत को सहेजने और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने का संकल्प दोहराया। बोरी ग्राम में निकला यह विशाल जुलूस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की एकजुटता, अस्मिता और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व करने का एक सशक्त प्रतीक बन गया।

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