उद्यम, साहस, शील, धैर्य, शक्ति और पराक्रम यह 6 वस्तु जिसके पास है वह सच्चा युवान है : आचार्य रामानुज

पारा। श्री सार्वजनिक गणेश मंडल एवं श्री रामायण मंडल द्वारा गणेश उत्सव में आयोजित एक दिवसीय प्रवचन में सर्वप्रथम प्रथम पूज्य गणेश भगवान की संतो के आतिथ्य में पूजन अर्चन के साथ आरती की गई साथ ही मंडल के वरिष्ठ संजय शर्मा,लाखनसिंह राजपूत,ओंकार सिंह परमार,दिनेश चौहान,नरेंद्र सिंह सोलंकी,रविंद्र कदम युवा सदस्य चेतन सिंह राजपूत,राजकुमार सरतलिया,यशवंत कटारा,नानू प्रजापत,अर्जुन प्रजापत, लक्की वैरागी, गौरव कहार द्वारा पुष्प माला साल श्रीफल भेंट कर संतो का स्वागत सम्मान किया गया। मंडल के अमृत राठौड़ द्वारा स्वागत उद्बोधन दिया गया आभार शुभम सोनी ने माना इस आयोजन में पारा,रानापुर व आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। 

प्रसिद्ध कथा वाचक आचार्य श्री रामानुज जी महाराज राजकोट द्वारा युवाओं में ऊर्जा के संचार स्वरूप प्रवचन किए गए। युवानी ओर अध्यात्म विषय पर नगर में आयोजित प्रवचन में आचार्य रामानुज जी ने कहा कि उद्यम,साहस,शील,धैर्य,शक्ति और पराक्रम यह 6 वस्तु जिसके पास है वह सच्चा युवान है । कभी अपने आप से सवाल करे कि सोशियल मीडिया में कितने सोशियल ओर कितने एन्टी सोशियल है ? लगभग 11 वर्ष पूर्व आचार्य रामानुज जी रामानंदाचार्य जयंती के अवसर पर पंचदिवसीय सत्संग सत्र हेतु आये थे पुनः आज युवानो के आग्रह पर व्यवस्त समय मेसे एक दिन का अल्प समय हेतु पधारे । 

उन्होंने कहा रामायण के प्रसंग अनुसार सौ योजन समुद्र कोन लांघे इस विषय पर चर्चा हो रही थी , सुग्रीव ने कहा था कि बिना जानकी जी की सुध लिए किष्किंधा वापस मत आना नही तो मृत्यु निश्चित है , ऐसी स्थिति हर किसी को आती है , सब अपनी अपनी बात कहते है , पारा नगर के नाम पर अंगद की बात बताते हुए उन्होंने विनोद में कहा कि स्वयं अंगद ने कहा कि जाऊ में पारा। इसी प्रसंग को युवानो को संबोधित किया , बुजुर्गों के पास शक्ति बहाल ही कम हो किंतु अनुभव बहुत ज्यादा होता है । जैसे गुरु शिष्य का सम्बोधन करते है वैसे ही लिहाजे जाम्बवान जी हनुमान जी को जागृत करते हुए प्रत्येक युवान को जागृत किया। किष्किंधा कांड का प्रसंग कहता है कि ऐसा कोनसा कार्य है जो युवान नही कर सकते है , बस केवल योग्य मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । युवानी जो चाहे वो करसकती है बस संग अच्छा होना चाहिए। आजकल दो पीढ़ियों के बीच सामंजस्य नही बेठ पाता है उन कारणों को खोजने कि जरूरत है आपकी अकर्मण्यता वाली युवानी से आपके बुजुर्गों की परेशानी है 

 उद्यम: ( मेहनती ) होना युवानी का पहला लक्षण है । 

आलस्य  को छोड़कर लक्ष्य प्राप्ति हेतु मेहनत करे वह युवान युवान है । पान की दुकानों और इधर उधर की बात में व्यर्थ समय बर्बाद करने वाले युवान युवानी पर कलंक है । अपनी जिम्मेवारी मेभी जब लोग भगवान को बीच मे लाते तो पीड़ा होती है ,  

– साहस : घरवालों से झूठ बोलकर नशा करने चले जाना साहस नही होता , यह दुस्साहस होता है , ज्यादातर युवान साहस के नाम पर दुससाहस की ओर बढ़ रहे है ,कमाए बिना नशे में पैसे उड़ाना साहस नही समय की बर्बादी एव दुस्साहस है । 

एक बार सत्संग में बैठकर हुए निर्णय को क्रिया में लाना साहस है।  जब कोइ युवान साहस करता है तो विधि का लेख भी बदल सकता है बस साहस  यथार्थ की धरातल पर होना चाहिए । 

धैर्य : सतत सफलता की ललक में लगे रहना धैर्य है , 

धैर्य और आलस में फर्क होता है ।  समय पर जागने वाला विजय होता है । 

शील : आप जो बनना चाहते है पूरे बनिये ढ़ी अधूरे नही , चाहे व्यापार, राजनीति, या कोईभी क्षेत्र हो , मौसम के जैसे लक्ष्य मत बदलो । 

शक्ति : युवान वह होता है जिसकी आवाज में , भुजाओं में ताकत हो ,हर छोटी मोटी बात पर रास्ता बदलने वाला युवा नही होता , 

पराक्रम : युवानी में पराक्रम होना चाहिए जैसे हनुमान जी मे था। इन सूत्रों के द्वारा आचार्य जी मे विस्तार पूर्वक युवाओं को प्रेरणा से परिपूर्ण आयोजन का समापन हुआ , उक्त आयोजन में पिपलखूँटा के श्री महंत 1008 पूज्यपाद दयाराम दास जी महाराज एवं फतियापुरा के महंत श्री गरुड़दास जी महाराज की भी आशीर्वादात्मक उपस्थिति रही   ।