जीवन लाल राठौड़, सारंगी
आरोग्य की देवी मां शीतला की आराधना का पावन पर्व शीतला सप्तमी पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में लोक परंपराओं का सुंदर दृश्य देखने को मिला। महिलाओं ने विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की।
पर्व की शुरुआत एक दिन पूर्व षष्ठी से ही हो गई थी। इस दिन महिलाओं ने घरों में श्रद्धाभाव से विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान और व्यंजन तैयार किए। परंपरा के अनुसार सप्तमी की अलसुबह महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर, हाथों में पूजा की थाली लेकर और माता के भजन गाते हुए मंदिर पहुंचीं, जहां उन्होंने मां शीतला को एक दिन पूर्व बने बासी भोजन का नैवेद्य अर्पित किया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा जलाना वर्जित माना जाता है। इसलिए सभी परिवारों ने माता को भोग लगाने के बाद स्वयं भी बासी भोजन, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बसौड़ा’ कहा जाता है, का सेवन किया।
