रोटला में स्वामी प्रणवानंदजी के श्रीमुख से हुई श्रीमद् भागवत कथा 

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झाबुआ डेस्क। ​झाबुआ जिला मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर दूर ग्रामीण अंचल रोटला में धर्म रक्षक सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का शुक्रवार को श्रद्धापूर्वक समापन हुआ। 21 मार्च से 27 मार्च 2026 तक चले इस आध्यात्मिक महोत्सव में धर्मध्वजा पताका के साथ पंचकोशी के 25 गांवों के जनजाति भाइयों और सर्व समाज ने अपनी सक्रिय सहभागिता दर्ज कराई। कथा का वाचन व्यास पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर 1008 स्वामी प्रणवानंद सरस्वती जी महाराज के श्रीमुख से हुआ, जिनके साथ झाबुआ जिले के संत शिरोमणि सेमलिया धाम के कानू जी महाराज ने भी उपस्थित भक्तों को धर्म और नीति के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।

​इस भव्य आयोजन का प्रारंभ मातृ शक्ति द्वारा निकाली गई भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ था। विगत सात दिनों तक स्वामी प्रणवानंद सरस्वती जी ने चार वेद, पुराण, गीता एवं श्रीमद् भागवत महापुराण की गहन व्याख्या करते हुए भगवान श्री कृष्ण के वात्सल्य और असीम प्रेम की लीलाओं का वर्णन किया। कथा के दौरान समाज में व्याप्त अत्याचार, कटुता और व्यभिचार को दूर कर एक सुंदर समाज के निर्माण के लिए युवाओं को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। छठे दिन भगवान कृष्ण और माता रुक्मिणी विवाह की जीवंत झांकी सजाई गई, वहीं अंतिम दिन रास लीला, मथुरा गमन, कंस वध, कुब्जा उद्धार और सुदामा चरित्र के प्रसंगों ने भक्तों को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। संगीत की मधुर धुनों और भजनों ने उपस्थित जनसमूह को नृत्य करने पर विवश कर दिया।

​आध्यात्मिक उत्थान के साथ-साथ स्वामी जी ने राष्ट्र रक्षा और सेवा का मूल मंत्र देते हुए कहा कि वास्तविक पाप कमजोरी, भय और स्वार्थ है। उन्होंने हिंदू समाज को एकजुट करने, शिक्षा के प्रसार और अछूत प्रथा के उन्मूलन पर जोर दिया। महामंडलेश्वर ने स्पष्ट किया कि बिना हिंदू एकता के हिंदू राष्ट्र का सपना साकार नहीं हो सकता, इसलिए जातियों और संप्रदायों के भेदों को भुलाकर एकता की भावना को मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने धर्मांतरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि गरीबी नहीं बल्कि धर्म की उपेक्षा इसका मुख्य कारण है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति तक सनातन धर्म का ज्ञान पहुँचाना और आचार संहिता का पालन करना अनिवार्य है।

​आयोजन के दौरान कथा स्थल के समीप ही बांस और घास से निर्मित भव्य श्री राम यज्ञ शाला में प्रतिदिन विभिन्न गांवों के यजमानों ने आहुतियां दीं और परिक्रमा कर धर्म लाभ लिया। सातों दिन कथा की समाप्ति के पश्चात अलग-अलग गांवों के जनजाति भाइयों के सहयोग से विशाल महाप्रसादी भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। दोपहर 5 बजे से रात 8 बजे तक चलने वाली इस संगीतमयी कथा में स्थानीय ग्रामीणों के अलावा दूर-दराज से आए नर-नारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।

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