मानव जीवन अति दुर्लभ, यह चिंतामणि रत्न के समान, इसे व्यर्थ न गंवाएं : साध्वी प्रियल ज्योति श्री

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भूपेंद्र चौहान, चंद्रशेखर आजाद नगर

स्थानीय जैन मंदिर में पधारीं साध्वी प्रियल ज्योति श्री ने प्रेरक प्रवचन देते हुए कहा कि मानव जीवन अति दुर्लभ चिंतामणि रत्न के समान है, इसे आलस्य, लोभ और अविवेक में न गंवाना चाहिए। उन्होंने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि जैन धर्म में केवल पर्युषण पर्व के आठ दिन ही नहीं, बल्कि जीवनभर धर्म आचरण करना आवश्यक है। समय और परिस्थिति के अनुसार धर्म क्रिया निरंतर करते रहना चाहिए।

साध्वी श्री ने कहा कि जितना व्यक्ति का धन बढ़ता है, उतना ही उसका लालच भी बढ़ जाता है, इसलिए व्यक्ति को सदैव संयम और संतोष बनाए रखना चाहिए। भगवान को कभी ठगने का प्रयास नहीं करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सब देखता है और उसकी कृपा के बिना कोई भी कार्य संभव नहीं होता। जीवन में एक बार नहीं, बल्कि बार-बार भगवान को धन्यवाद कहना चाहिए। उन्होंने बताया कि अच्छा श्रावक वही है जो जीव दया और गोदया का पालन करता है। बोलने में विनय, चलने में विनय, खाने में विनय और व्यापार-व्यवसाय में भी विनय आवश्यक है। व्यापार हमेशा नीति और ईमानदारी से करना चाहिए। 

साध्वी श्री ने जल संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि पानी की एक बूंद में भी असंख्य जीव होते हैं, इसलिए जैन धर्म के अनुसार जल का उपयोग अत्यंत सीमित और सावधानी से करना चाहिए। इसी प्रकार वाणी में भी विवेक जरूरी है। इस पृथ्वी पर सभी जीवों को जीने का समान अधिकार है।

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