धुलेंडी पर गल पर्व मनाया, मन्नतधारियों ने उल्टा लटककर की परिक्रमा

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खरडू बड़ी। आदिवासी अंचल में आदिवासी समाज में अनेक सांस्कृतिक परंपरा है वर्षों से प्रचलित है कदम कदम पर यहां लोग पर्व मनाते हैं विभिन्न परंपराओं का पालन समाज द्वारा किया जाता है इसी प्रकार आदिवासी अंचल में समाज का एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसे गल पर्व कहा जाता है जो के होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी पर प्राचीन काल से गल पर्व मनाते आ रहे हैं।

यह पर्व आस्था और शोर्य का प्रतीक है इस बार आदिवासी क्षेत्र में अलग-अलग दिन धुलेंडी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी जिसको लेकर यह पर्व किसी ने एक दिन पहले तो किसी ने एक दिन बाद मनाया लेकिन झाबुआ जिले के गांव खरडू बड़ी में मंगलवार रात्रि में करीब 12:00 बजे होलिका दहन के बाद अगले दिन बुधवार 4 मार्च को सुबह धुलेटी मनाई गई इसके बाद शाम को गल पर्व मनाया गया गांव से करीब तीन से चार किलोमीटर दूर टिचकिया गांव में 20 फीट ऊंचे मचान से उल्टे लटक कर मन्नत धारी अपनी मन्नत पूरी करते हैं जिसको देखने के लिए आसपास के लोग काफी संख्या में एकत्रित हुए यहां पर 20 फीट का मचान स्थाई रूप से बना हुआ है जब कोई समाज मनोकामना करता है किसी विपत्ति में होता है या कोई अप्रिय घटना होने की संभावना से मन विचलित होता है तो वह आस्था के साथ गल देवता यानी बाबजी की मन्नत ले लेता है जब यह कार्य सिद्ध हो जाता है तो मन्नत धारी को गल पर्व के द्वारा अपनी मन्नत उतारना रहती है।

*ऐसे उतारते है मन्नत?*

धुलेंडी के दिन मन्नत धारी गल बाबजी के स्थान पर पहुंचता है यहां मचान पर मन्नतधारी रस्सी के सहारे उल्टा लटकता है फिर हवा में घूमता है गल बाबजी की सात बार परिक्रमा करता है इस दौरान पूजन होता है और बकरे की बलि भी दी जाती है।

*सालों से चली आ रही परंपरा*

ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा आदिवासी समाज में हजारों सालों से चली आ रही है गल बाबजी की पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक समरसता मानवता प्रकृति के साथ सह अस्तित्व पर प्रतीक है।

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