मयंक विश्वकर्मा, आम्बुआ
होलिका दहन के पश्चात धुलैंडी पर रंग खेलने की परंपरा लगभग समाप्त हो चली है, छोटे छोटे बच्चे ही इस परंपरा का निर्वहन करते नजर आए थे।रंग पंचमी पर भी वह उत्साह नजर नहीं आया , केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है त्योहार, आज पंचमी पर कुछ युवाओं तथा हिन्दू सनातन धर्मावलंबियों ने परंपरा को जीवित रखने का प्रयास किया।

होलिका दहन के बाद क्षेत्र में धुलैंडी पर जम कर रंग खेलने की परंपरा आम्बुआ की रही है, पूर्व में एक दिन शहरी तथा कस्बाई क्षेत्र में लोग धुलैंडी पर रंग खेलने एकत्रित होते थे तथा दूसरे दिन पुलिस विभाग के द्वारा रंग खेला जाता था।

बगैर किसी जाति धर्म, समाज को देखे छोटे बड़े के भेद भाव को देखे बिना रजामंदी से सभी को रंग लगाते थे और जमकर मस्ती होती थी, रंग के साथ भंग का मजा ही कुछ और था,घरों में घुस कर और बाहर निकाल कर रंग खेला जाता था कोई भी बुरा नहीं मानता था, मगर अब ऐसा नहीं है, अन्य समाज ही नहीं अपितु जिनका त्योहार है वह समाज भी अपनी संस्कृति पर्व पर बाहर निकल ने से परहेज़ करने लगे हैं।

त्योहार पर भी राजनीति का आवरण चढ़ गया दिखाई देने लगा है, त्योहार अब केवल औपचारिकता बनकर रह गया है ,यह आज रंग पंचमी पर भी देखने को मिला, लेकिन तारीफ करना पड़ेगी युवाओं की हरिजन आवास फलिया के युवाओं व भीलसेना की तथा हिन्दू सनातन धर्मावलंबियों के युवाओं की जिन्होंने जम कर रंग तो खेला ही साथ ही रंगा रंग गैर भी ढोल मांदल की धुन पर पारंपरिक नृत्य के साथ निकाली तथा रंगारंग रंग पंचमी मनाई। हालांकि इस अवसर पर छोटे छोटे बच्चे तथा महिला मंडल व बाल शिव भक्त मंडल भी पिछे नहीं रहा,।जिन परिवारों में विगत दिनों किसी अपने प्रिय जन का स्वर्गवास हुआ था उन परिवारों में जाकर गम दूर करने हेतु रंग डाला गया।
